Friday, 17 September 2010

सिपाही की यादें !

उस पार से जब एक गोली आती थी
मानो डाक की तरह हजारों यादें जगा जाती थी !

गुज़रती कुछ इस तरह सर के बगलों से
जैसे माँ फेरती हो हाथ मेरे बालों पे !

बिलकुल वैसे ही सरसरी सी छुट जाती थी
जब देखा था तुम्हे पहली बार मेरी नज़रों ने !

बम से उड़ता काला धुआं... कुछ लगता था ऐसा
जैसे पहली बारिश का बदल उमड़ता आ रहा हो !

कानो में थोडा सन्नाटा सा छाया था
पर तुम्हे फिर भी सुन पा रहा था में !

और जब घायल हो गिर रहा था
तो बस... यही सोचता रहा...
कि बाबूजी अभी उसी ऊँगली से थामेंगे मुझे...
जिसे बचपन में पकड़...संभल जाता था में !

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