उस पार से जब एक गोली आती थी
मानो डाक की तरह हजारों यादें जगा जाती थी !
गुज़रती कुछ इस तरह सर के बगलों
जैसे माँ फेरती हो हाथ मेरे बा
बिलकुल वैसे ही सरसरी सी छुट जा
जब देखा था तुम्हे पहली बार मे
बम से उड़ता काला धुआं... कुछ लगता था ऐसा
जैसे पहली बारिश का बदल उमड़ता
कानो में थोडा सन्नाटा सा छाया था
पर तुम्हे फिर भी सुन पा रहा था में !
और जब घायल हो गिर रहा था
तो बस... यही सोचता रहा...
कि बाबूजी अभी उसी ऊँगली से थामेंगे मुझे...
जिसे बचपन में पकड़...संभल जाताथा में !
और जब घायल हो गिर रहा था
तो बस... यही सोचता रहा...
कि बाबूजी अभी उसी ऊँगली से था
जिसे बचपन में पकड़...संभल जाता
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